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Showing posts from October, 2021

कहमुकरी (1)

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कहमुकरी धूप यहाँ छाँव वहाँ खेले। चाल हवा की है वो झेले। मनुहार कभी उसकी झिड़की। क्या सखी साजन? ना सखि खिड़की ।। 1 वेणी जस वह देखो झूमें। लाली लाल रंग वो चूमें। खिला मनोहारी वो गेसू। क्या सखी साजन? ना सखि टेसू ।।2 बातों  में हो आप लड़ाई। बातों में ही आज बड़ाई । मधुरम सी उसकी अभिलाषा। क्या सखी साजन? ना सखि भाषा।।3 लाली काली जुड़ती संगी। दिखती कितनी वो है चंगी। समझ बनाया उसको चूड़ा। क्या सखी साजन? ना सखि जूड़ा ।।4 चाल चले है वह तो न्यारी। बातें करती सुंदर प्यारी। सहती उसकी नित मनमानी। क्या सखी साजन? नहीं जवानी।।5 बातें वो मधुरिम हीं बोले। वाणी में बस मिश्री घोले।  कहता वह तो सब है चोखा।  क्या सखी साजन? न सखि धोखा।।6 देश की जो याद दिला दे। चेहरे पर मुस्कान खिला दे।  देखे वो कब  गर्मी सर्दी।  क्या सखि साजन? न सखि वर्दी।।7  आते ही ठंडक आ जाती।  बर्फीली दुनिया दिखलाती।  घूम रही वो देखो विमला। क्या सखी सौतन? न सखि शिमला।।8 कहमुकरी  दिनांक-19-10-21 जीवन लगता उसको खारा। बढ़ता ही जाता है पारा। बहे आँख से उसके नीर।  क्या सखि विरहन?  न सखि प...

दीप और बाती- अनिता मंदिलवार सपना

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  सपना सुप्रभाती  दीप जले है भोर तक, बाती का है संग । नभ ताके जो भोर है, जैसे उड़े पतंग ।। ऽ●अनिता मंदिलवार सपना 

गंगोदक सवैया- अनिता मंदिलवार सपना

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  गंगोदक सवैया मापनी- 212 212 212 212 , 212 212 212 212 मात हंसासना आप मेरी सुनो, भक्त हूँ माँ कहूँ क्या तुझे शारदे । ज्ञान दे दो मिटे आज अज्ञानता, प्रार्थना है यही, ज्ञान माँ चार दे । छंद की ये विधा सीख लूँ मैं यहाँ, छांदसी काव्य का माँ अभी सार दे। साधना लेखनी की चले जो अभी, शब्द हो सारथी काज को पार दे । अनिता मंदिलवार सपना