कहमुकरी (1)
कहमुकरी
धूप यहाँ छाँव वहाँ खेले।
चाल हवा की है वो झेले।
मनुहार कभी उसकी झिड़की।
क्या सखी साजन? ना सखि खिड़की ।। 1
वेणी जस वह देखो झूमें।
लाली लाल रंग वो चूमें।
खिला मनोहारी वो गेसू।
क्या सखी साजन? ना सखि टेसू ।।2
बातों में हो आप लड़ाई।
बातों में ही आज बड़ाई ।
मधुरम सी उसकी अभिलाषा।
क्या सखी साजन? ना सखि भाषा।।3
लाली काली जुड़ती संगी।
दिखती कितनी वो है चंगी।
समझ बनाया उसको चूड़ा।
क्या सखी साजन? ना सखि जूड़ा ।।4
चाल चले है वह तो न्यारी।
बातें करती सुंदर प्यारी।
सहती उसकी नित मनमानी।
क्या सखी साजन? नहीं जवानी।।5
बातें वो मधुरिम हीं बोले।
वाणी में बस मिश्री घोले।
कहता वह तो सब है चोखा।
क्या सखी साजन? न सखि धोखा।।6
देश की जो याद दिला दे।
चेहरे पर मुस्कान खिला दे।
देखे वो कब गर्मी सर्दी।
क्या सखि साजन? न सखि वर्दी।।7
आते ही ठंडक आ जाती।
बर्फीली दुनिया दिखलाती।
घूम रही वो देखो विमला।
क्या सखी सौतन? न सखि शिमला।।8
कहमुकरी
दिनांक-19-10-21
जीवन लगता उसको खारा।
बढ़ता ही जाता है पारा।
बहे आँख से उसके नीर।
क्या सखि विरहन? न सखि पीर।।9
अंधेरा वीरानी छाये।
गली भी सुनसान हो जाये।
मातम उसका पूछे कौन।
क्या सखी विधवा? न सखी मौन।।10
बातों से वह खूब लुभाएँ।
अच्छी बातें खूब सुनाएँ।
उसको लगे है यह पहेली।
क्या सखी सजनी? नहीं सहेली।।11
दमकती जहाँ है बस बिजली।
हो धरा सुभाषित जस तितली।
देखते बनता उसका भौन।
क्या सखी धरती? न सखी रौन।।12
अनिता मंदिलवार सपना
अच्छा लिखा है ।
ReplyDeleteआभार भैया जी
Deleteसुंदर मनभावन सृजन अनिता 💐 - गीतांजलि
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